उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच ने सीएम धामी से मुलाकात कर गढ़वाली कुमांऊनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की उठाई मांग

उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच ने सीएम धामी से मुलाकात कर गढ़वाली कुमांऊनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की उठाई मांग

देहरादूनः उत्तराखंड की लोकभाषा और यहां की संस्कृति को बचाने के लिए समाज के प्रबृद व्यक्तियों के द्वारा लगातार आवाज उठाई जाती रही है. उत्तराखंड की लुप्त होती भाषाओ को बचाने के लिए लगातार उत्तराखंड के लोककवि, संस्कृतिकर्मी, लोकगायक और समाजिक कार्यकर्ताओ द्वारा लगातर आवाज उठाई जा रही है. उत्तराखंड की लोकभाषा गढ़वाली, कुमांऊनी और

देहरादूनः उत्तराखंड की लोकभाषा और यहां की संस्कृति को बचाने के लिए समाज के प्रबृद व्यक्तियों के द्वारा लगातार आवाज उठाई जाती रही है. उत्तराखंड की लुप्त होती भाषाओ को बचाने के लिए लगातार उत्तराखंड के लोककवि, संस्कृतिकर्मी, लोकगायक और समाजिक कार्यकर्ताओ द्वारा लगातर आवाज उठाई जा रही है.

उत्तराखंड की लोकभाषा गढ़वाली, कुमांऊनी और जौनसारी भाषा आज अपने अस्तित्व के लड़ रही है लेकिन सरकारों द्वारा इन भाषाओं की अपेक्षा की जा रही है. इन्ही भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए कई सालों से उत्तराखंड और दिल्ली समेत पूरे देश में उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच काम करता आ रहा है. जिसमें उत्तराखंड के कई जाने माने कवि, लेखक और समाजसेवक जुड़े हुए हैं.

इसी क्रम में 1 जुलाई को उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य मंच दिल्ली का एक प्रतिनिधि मण्डल ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तथा भाषा मंत्री सुबोध उनियाल से मुलाकात करके एक मांग पत्र सौंपा गया.

जिसमें मांग की गई कि उत्तराखण्ड सरकार गढ़वाली कुमांऊनी और जौनसारी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु विधानसभा में प्रस्ताव लाकर उसे चर्चा के बाद पास करके केन्द्र सरकार को भेजने की मांग की गई.जिसमें गढ़वाली कुमांऊनी और जौनसारी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग स्पष्ठ हो।

उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य मंच दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी ने कहा कि कि गढ़वाली कुमांऊनी और जौनसारी भाषाओं, यें लगभग तेरह सौं साल पुरानी भाषाएं हैं तथा इनमें हर विधा में साहित्य सृजन हो रहा है। इसलिए अब समय आ गया है कि इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।

उत्तराखंड के प्रसिद् समाजसेवी अनिल पंत ने कहा कि उत्तराखंड की लोकभाषा उत्तराखंड की आत्मा है यदि ये भाषा खत्म हो जायेंगी तो उत्तराखंड की आत्मा खत्म हो जायेगी. जिससे प्रदेश के अस्तित्व पर बड़ा सवाल खड़ा हो जायेगा.ऐसे में उत्तराखंड की आत्मा और इसके अस्तित्व को बचाने के लिए इन भाषाओं को बचाना बहुत जरूरी है.

उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य मंच लगातार कई वर्षो से इस दिशा में कार्य कर रहा है। केन्द्र सरकार को मंच इस विषय पर पूर्व में चार ज्ञापन सौंप चुका है और उत्तराखंड सहित दिल्ली एनसीआर में लगातार जनता के बीच जाकर इस दिशा में कार्य कर रहा है।

दिल्ली से आये प्रतिनिधिन मण्डल में साहित्यकार जयपाल सिंह रावत, अनिल पन्त, जगमोहन सिंह रावत जगमोरा, दर्शन सिंह रावत, सुशील बुड़ाकोटी व दिनेश ध्यानी आदि शामिल थे।

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